आधुनिक चकाचौंध और दिखावे की लत पीछे छोड़ रही हैं परंपराएं, रिवाज़ों से भी दूर होते जा रहे लोग

बीकानेर। दीपावली का त्योहार नजदीक आते ही बाजारों में रौनक बढ़ने लगी है।लोग घरों की सजावट और खरीदारी में जुट गए हैं। लेकिन त्योहार की यह चमक आधुनिकता के चलते परंपराओं को पीछे छोड़ती दिख रही है।
पांच दिवसीय दिवाली की चमक के बीच मिट्टी के दीपक और बर्तन बनाने वाले कुम्हारों की चिंता भी बढ़ रही है। आधुनिक सजावट और चाइनीज इलेक्ट्रिक लाइटों के बढ़ते चलन ने उनके पुश्तैनी कारोबार को प्रभावित किया है। जिले में कुम्हार परिवार आज भी अपनी पारंपरिक कला को बचाने के लिए दिन-रात मेहनत करते देखे जा सकते हैं।
समय के साथ दीपावली मनाने का तरीका भी बदल रहा है। पहले लोग त्योहार पर घरों में मिट्टी के दीये जलाकर सजावट करते थे, लेकिन अब रंग-बिरंगी झालरों, चाइनीज लाइटों और इलेक्ट्रिक सजावट की मांग बढ़ गई है। इसका सीधा असर मिट्टी के दीपक बनाने वाले कारीगरों के कारोबार पर दिखाई दे रहा है। कुम्हारों का कहना है कि मेहनत और लागत लगाने के बावजूद पहले जैसी बिक्री नहीं हो रही है।ऐसे में उनके सामने परिवार की आजीविका चलाने के साथ अपनी पुश्तैनी कला को बचाए रखने की चुनौती भी है।
दीपावली की तैयारियों के बीच कुम्हार परिवारों के घरों में भी काम तेजी से चल रहा है। परिवार के पुरुष मिट्टी के दीपक, मटके और दूसरे बर्तन तैयार करने में जुटे हैं, वहीं घर की महिलाएं इन पर रंग-रोगन और नक्काशी कर इन्हें सुंदर रूप दे रही हैं।
कुम्हारों के हाथों से तैयार होने वाला हर दीपक सिर्फ मिट्टी का सामान नहीं, बल्कि हमारी पुरानी परंपरा और संस्कृति की पहचान है। इन दीपकों से कभी हर घर का आंगन रोशन होता था, लेकिन अब बाजार में इन्हें अपनी जगह बनाए रखने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।
स्थानीय कारीगरों से मिट्टी के दीये खरीदने की अपील
कुम्हारों का कहना है कि दीपावली पर लोग मिट्टी के दीये खरीदकर उनकी मेहनत को सहारा दे सकते हैं।इससे न केवल स्थानीय कारीगरों की आमदनी बढ़ेगी, बल्कि हमारी पारंपरिक कला और संस्कृति को भी आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी। त्योहार पर घरों को रोशन करने के साथ उन हाथों का भी ख्याल रखना जरूरी है, जो मिट्टी को आकार देकर दीपावली की खुशियां खास बनाते हैं।
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